कर्क लगन की कुंडली है गुरु लगन में वक्री होकर विराजमान है,दूसरे भाव में शनि वक्री है और राहू के साथ है,शुक्र छठे भाव में विराजमान है,सप्तम में मकर का चन्द्रमा है,बुध केतु मंगल सूर्य अष्टम भाव में विराजमान है.राहू की दशा चल रही है और चन्द्रमा का अंतर है.
कर्क लगन का चन्द्रमा स्वामी है और जब चन्द्रमा सप्तम भाव में बैठ जाता है और लगन में विराजमान गुरु वक्री को देखता है तो जातक के अन्दर भावना अपने परिवार विचार और समाज से अलग हो जाती है,वह सोचता है की पत्नी का रूप ऐसा हो जो अपने दिमाग से धन कमाना जानती हो और जातक की भावना जो वक्री गुरु से प्रताणित है के अनुसार भाव विदेशी रहन सहन और आधुनिकता से पूर्ण हो,गुरु से आगे शनि वक्री और राहू के होने से वह विवाह के बाद जल्दी से धनवान बन जाए तथा जीवन के शौक शादी के द्वारा ही पूरे करे. चन्द्रमा मन का कारक है और चन्द्रमा से दूसरे भाव में सूर्य से मतलब होता है की जातक अपने जीवन साथी के पिता के द्वारा धन को प्राप्त करे,बुध का मतलब होता है की जीवन साथी के द्वारा ही व्यापार और बुद्धि से धन की प्राप्ति हो केतु का मतलब होता है वह केवल आदेश दे और कार्य पूरा हो मंगल का मतलब है की वह जीवन साथी की तकनीकी बुद्धि से ही धन को प्राप्त करे.
चन्द्रमा से अष्टम में जब शनि राहू होते है और शनि वक्री होता है तो जातक की बुद्धि में चालाकी का मिश्रण माना जाता है,उसे गूढ़ विषयों से धन की प्राप्ति की लालसा रहती है वह किसी ऐसे उद्देश्य में अपने को आगे ले जाना चाहता है जहां मेहनत भी नहीं हो और कार्य भी पूरा हो जाए तथा किसी भी प्रकार से उसकी चालाकी को कोइ समझ भी नहीं पाए और वह अपने कार्य को पूरा करने के कारणों में लगा भी रहे.कभी तो उसका दिमाग अपने व्यापार को करने का होता है कभी वह नौकरी करने के बाद धन को कमाने की लालसा रखता है कभी वह जल्दी से धन कमाने वाले साधनों जैसे लाटरी सट्टा जुआ शेयर आदि से धन कमाना चाहता है और कभी वह अपनी चालाकियों से सरकारी साधनों से धन कमाने के लिए कोइ भी भी गलत काम करने की सोच कर धन कमाने के उद्देश्य में पूरा होना चाहता है.
चन्द्रमा के आगे बुध केतु सूर्य मंगल के होने से जातक बहिन मामा पिता भाई आदि से धन और भौतिक सहायता को लेना चाहता है और गुप्त रूप से चन्द्रमा से बारहवे भाव में विराजमान शुक्र जो धनु राशि का है पर खर्च करना चाहता है,अक्सर इस प्रकार की ग्रह युति से यह भी अंदाज लगाया जाता है की जातक की शादी राहू की दशा में दो बार भी हो सकती है और उसके भ्रम के द्वारा पत्नी से नहीं बन पाती है इसके कारण से वह अपने परिवार से धन को लेकर कोर्ट कचहरी से पत्नी को धन देने के लिए मजबूर हो जाता है,अर्थात जितना वह अपने दिमाग से चालाकी के लिए चलता है उतना ही यह छठा शुक्र से उससे लेकर अपनी मौज मस्ती में चलता रहता है और जातक के परिवार की कठिन कमाई इसी प्रकार के कारणों में जाती रहती है.
कर्क का गुरु अगर कुम्भ राशि से छठे भाव में होता है तो जातक के चार बहिने हो सकती है इन बहिनों के द्वारा जातक को समय समय पर सहायता मिलाती रहती है और उनके द्वारा जोड़ा गया धन जातक किसी प्रकार की अपनी व्यक्तिगत मुशीबत को बताकर लेता रहता है तथा उसे अपने कारणों में खर्च करता रहता है.
सिंह राशि का शनि अगर वक्री होता है तो जातक के अन्दर हमेशा मनोरंजन वाली बातो को दिमाग में लेकर चलने वाली बात मानी जा सकती है वह कमाने के नाम पर कमोडिटी शेयर बाजार या इसी प्रकार के कार्य ब्रोकर की तरह से करता है और हमेशा अपने चालाकी वाले कारणों से बजाय कमाने के खर्च ही करता रहता है.
एक बात जातक के लिए और भी मानी जा सकती है की उसकी माता के द्वारा कहे गए शब्द हमेशा सही होते है इसका कारण है की चन्द्रमा जो घर में दूसरी माता के रूप में अपने को साबित करती है वह अगर किसी को बिना सोचे समझे कोइ बात कह देती है तो वह बात पूरी हो जाती है.जातक की शादी और वैवाहिक संबंधो के मामले में राहू की दशा समाप्ति के बाद ही किसी प्रकार का सुख माना जा सकता है.गुरु की दशा जातक के लिए अप्रैल दो हजार चौदह से शुरू होगी.!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

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